चारे के अभाव में कूडे के ढेर में खाना तलाशती गायें

On 28/06/2017    | Time: 11:27:07 AM | Source: Mathura News | Visits: 135



चारे के अभाव में कूडे के ढेर में खाना तलाशती गायें
मथुरा (सुनील शर्मा) । मथुरा वृन्दावन में गायों को अब चारा नही मिल रहा है जिसके कारण गाय कचरे में से अपना भोजन तलाशती फिर रही हैं। जगह जगह गायों को कूडे के ढे़र के पास या किसी मैरिज होम के निकट डलाब घर पर खाना तलाशते देखा जा सकता है। स्वयंसेवी संस्थाएं व गायों के प्रति श्रद्धा रखने वाले धार्मिक लोग इसे देख दुखी तो होते हैं। लेकिन इन गायों के लिए कुछ करना उचित नहीं समझते हैं। एक तरफ गाय को अपनी मां कहते है। वहीं दूसरी ओर क्षेत्र में तमाम गौशालाए जिनको धर्म की आड में गौ भक्तो से मोटा दान चारे के लिए मिलता भी है वह भी इसे अनदेखा करते हैं।

श्रीकृष्ण की प्रिय गायों की आज दुर्दशा उनके ही जन्म स्थान में हो रही है। गायों के साथ कृष्ण की तमाम लीलाओं के मार्मिक प्रसंग के साथ कथा सुनाने बाले कथावाचक भी इस ओर देखते तक नहीं है।

ब्रज क्षेत्र में गायों की स्थिति बहुत खराव है।

एक तरफ तो गाय के नाम पर गौशाला संचालक भक्तो से मोटा धन प्रतिमाह बसूलते है वही दूसरी तरफ उनकी गौशालाओं में वही गाय रहती है जो दूध देती है। ब्रज में पहले लगभग हर परिवार में एक गाय को पाली जाती थी। लेकिन वर्तमान में गाय पालने की परम्परा समाप्त होती जा रही है। आजकल दूध का कारोवार करने वाले लोग भी गाय का दूध निकालने के वाद पूरे दिन गायों को आवारा घूमने के लिए छोड़ देते हैं। इसी का परिणाम है कि गायों को अपना आहार तलाशालने के लिये इधर-उधर भटकना पड रहा है। गाय कचरे के ढेर में अपना भोजन तलाशती है तो वही दूसरी ओर विवाह व अन्य अनुष्ठानों में जो कचरा सड़क पर फेक दिया जाता है उनको गाय अपना निवाला बनाने को मजबूर हो रही हैं। इससे गायों का स्वास्थ्य भी खराब हो रहा है इस प्रकार के कचरे में फैंकी गई पॉलीथिन की थैलियां गायों के पेट से निकलना आम बात हो गयी है।

एक तरफ तो हिन्दु गाय को अपनी माता कहते है वही दूसरी ओर विवाह की दावतो में बचा कुचा झूठन गायों का निवाला बना रहे है इस ओर किसी का ध्यान नहीं है।



कमाई लाखो की, कचरा सडक पर।

आजकल मैरिज होमों की लाखों की कमाई हो रही है। लेकिन इनके स्वामी शादियों के वाद यहां से निकलने वाले कचरे को सड़क पर डाल रहे हैं। जिसकों गाय अपना आहर मजबूरी में बना रही है। साथ ही नगर पालिका को नगर की सफाई करने के लिये कडी मशक्कत करनी पड रही है

नगर में सैकडो मैरिज होम बन गए है। एक दिन की शादी का जगह का किराया इक्यावन हजार से शुरू हो कर लाखों रूपये तक लोगों को देने पड रहे है लेकिन इन मैरिज होमों के स्वामी शादी हो जाने के बाद विवाहों व उत्सवों में कचरे का निस्तारण करने की कोई व्यवस्था नही करते है। मजबूरन नगर पालिका परिषद को सडक की सफाई व नगर को स्वच्छ रखने के लिये अपने तमाम संसाधनों का इस्तेमाल इसके लिये विवश होना पड़ता है। साथ ही गाय बडी संख्या में इन कचरे के ढेरो को देखकर प्रभावित होती है और खाने की वस्तु तलाशती हुई इसमें दिन भर अपने लिये खाना खोजती रहती है।



करोड़ों रूपये का दान आने के बावजूद गौ-वंश कूड़े-कचरे पर निर्भर

वृन्दावन। यह कैसी विडम्बना है कि गौ-रक्षक श्री कृष्ण की क्रीड़ास्थली में गौ-वंश अपना भरण-पोषण कूड़े-कचरे के ढेर से करने को मजबूर हैं। ऐसा नहीं है कि गौ-सेवक गाय आदि के निमित्त कोई प्रयास नहीं करते। बल्कि सामाजिक रूप से तथाकथित गौ-सेवकों के ज्यादा छाये रहने के कारण वास्तविक गौ-भक्तों को सामाजिक एवं आर्थिक सहयोग नहीं मिल पाता। लेकिन अपने सीमित संसाधनों के बदौलत उनका यह सेवा धर्म बदस्तूर जारी है। आज जिस प्रकार से धर्म के नाम पर अपनी दुकानें चलाने वालों ने विभिन्न प्रचार माध्यमों से स्वयं को भगवान कृष्ण एवं उनको सर्वाधिक प्रिय गायों का वास्तविक हितैषी के रूप में प्रचारित कर रखा है, उससे स्थानीय एवं बाहर से आने वाले श्रद्धालुगण दानदाता इन ढोंगियों की चिकनी चुपड़ी बातों में आ जाते हैं। सूत्र बताते हैं कि नगर से बाहर भागवत कथा व रासलीला करने वाले ब्रज की गायों के नाम पर करोड़ों रूपये दान के रूप में लेकर आते हैं और इस धन से गौ-सेवा के स्थान पर नामी-बेनामी संपत्तियाँ खरीद लेते हैं और धन को अपने निजी उपयोग में ही लाते हैं। दानदाता श्रद्धालुओं को दिखाने के लिये वे अपने घर/आश्रमों में दूध आदि के लोभवश पाली गयी गायों को दिखा देते हैं। यदि कोई बड़ा दानदाता आता है तो वे किसी भी गौशाला वाले से सैटिंग कर व कमीशन सैट कर उसकी गौशाला को अपने द्वारा संचालित बता कर दानदाता को वेबकूफ बना देते हैं। कुछ धर्माचार्यों ने तो बाकायदा अपनी निजी गौशालायें संचालित कर रखी हैं, जिसमें रखी 20-25 दूध देती गायों को ही बेसहारा, अनाथ गाय बताकर मोटी रकम वसूलते हैं। इधर गायों की दुर्दशा का एक बड़ा कारण नगर में जमीनों की बेहिसाब बढ़ती कीमत भी है। नगर से सटे ग्रामों में गौचारण की भूमि को प्रधानों व भू-राजस्व अधिकारियों ने मिलीभगत के द्वारा भूमाफियाओं के हवाले कर दिया। अब यदि गायों का पेट भरने के लिये हरियाली न मिलेगी, तो गायें कूड़ों के ढेर में पड़ी सड़ी-गली खाद्य सामग्रियों के भरोसे ही अपना जीवन-यापन करेंगी। इसके अतिरिक्त नगर की विभिन्न प्राचीन गौशालाओं के संचालकों की नीयत में आया खोट भी बहुत हद तक गायों की दुर्दशा का जिम्मेदार है। पुराने समय में बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं ने ब्रज की गौ-सम्पदा की रक्षा हेतु जगह-जगह पर एकड़ों जमीन लेकर गौशालाओं का निर्माण करवाया था। वे जब तक जीवित रहे, तब तक तो सब कुछ ठीक-ठाक रहा, परन्तु उनकी मृत्यु के पश्चात्् उनके वारिसों का ध्यान इस ओर नहीं गया। इसी का लाभ लेकर इन गौशालाओं का संचालन करने हेत नियुक्त सेवकों ने अपने आप को मालिक घोषित कर दिया और अवैध तरीके से गौशाला की बेशकीमती भूमि को खुर्द-बुर्द कर दिया। लेकिन गाय व ब्रज के नाम पर अर्श से फर्श पहुँचने वाले इन तथाकथित गौ-भक्तों को कब सुध आयेगी कि यदि ब्रज गाय से ही विमुख हो गया, तो ब्रज में बचेगा ही क्या ? क्योंकि वृन्दा अर्थात् तुलसी के वन के नाम से प्रसिद्ध वृन्दावन में तो तुलसी के पौधे तो नाम मात्र को ही रह गये हैं।